न जुस्तजू है किसी की, न जज़्बा है क़ायम, न यारी है किसी से, न कैद-ओ-काल का आलम। न सुरूर-ए-मय है ये, न शिकवा है ख़ुमार से, न चलते हैं […]
मुक्त मन के स्वर
शिक्षाएँ पूरी तरह से तैयार होकर नहीं आतीं — वे भाषा के माध्यम से धीरे-धीरे प्रकट होती हैं, ठीक वैसे ही जैसे भोर धीरे-धीरे उदित होती है। ये लेखन भीतर की यात्रा के सहयात्री के रूप में प्रस्तुत हैं: सत्य की संक्षिप्त झलकियाँ, जिन्हें धीरे-धीरे पढ़ा जाए, बार-बार लौटकर देखा जाए, और मन में शांतिपूर्वक उतरने दिया जाए।
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गर चाहिये कुछ ऐसा , जो मिला ना था अब से पहले, तो करना कुछ ऐसा, जो किया ना था अबसे पहले/ इक लम्हा ठहर कर , जब देखा इस […]
इक और सावन नाच ले, इक और सावन झूम ले। जीवन का जीवन ही क्या, जीते इक उड़ता धुआँ। जाने दूर से उठा हो इक दिया, कुछ देर तो उड़ता […]
न जुस्तजू है किसी की, न जज़्बा है क़ायम, न यारी है किसी से, न कैद-ओ-काल का आलम। न सुरूर-ए-मय है ये, न शिकवा है ख़ुमार से, न चलते हैं […]
गर चाहिये कुछ ऐसा , जो मिला ना था अब से पहले, तो करना कुछ ऐसा, जो किया ना था अबसे पहले/ इक लम्हा ठहर कर , जब देखा इस […]
इक और सावन नाच ले, इक और सावन झूम ले। जीवन का जीवन ही क्या, जीते इक उड़ता धुआँ। जाने दूर से उठा हो इक दिया, कुछ देर तो उड़ता […]