Shunya World

मुक्त मन के स्वर

शिक्षाएँ पूरी तरह से तैयार होकर नहीं आतीं — वे भाषा के माध्यम से धीरे-धीरे प्रकट होती हैं, ठीक वैसे ही जैसे भोर धीरे-धीरे उदित होती है। ये लेखन भीतर की यात्रा के सहयात्री के रूप में प्रस्तुत हैं: सत्य की संक्षिप्त झलकियाँ, जिन्हें धीरे-धीरे पढ़ा जाए, बार-बार लौटकर देखा जाए, और मन में शांतिपूर्वक उतरने दिया जाए।
हर सप्ताह नए निबंध प्रकाशित किए जाते हैं। उन्हें सीधे अपने इनबॉक्स में प्राप्त करने के लिए नीचे सदस्यता लें।

न जुस्तजू है किसी की, न जज़्बा है क़ायम, न यारी है किसी से, न कैद-ओ-काल का आलम। न सुरूर-ए-मय है ये, न शिकवा है ख़ुमार से, न चलते हैं […]

गर चाहिये कुछ ऐसा , जो मिला ना था अब से पहले, तो करना कुछ ऐसा, जो किया ना था अबसे पहले/ इक लम्हा ठहर कर , जब देखा इस […]

इक और सावन नाच ले, इक और सावन झूम ले। जीवन का जीवन ही क्या, जीते इक उड़ता धुआँ। जाने दूर से उठा हो इक दिया, कुछ देर तो उड़ता […]

Scroll to Top