न जुस्तजू है किसी की, न जज़्बा है क़ायम,
न यारी है किसी से, न कैद-ओ-काल का आलम।
न सुरूर-ए-मय है ये, न शिकवा है ख़ुमार से,
न चलते हैं कहीं को, न पासबाँ है क़ायम।
न मौजों में हूँ ठहरा, न साहिल में हूँ हरकत,
न शहरों में हूँ सावन, न वीरानों में पतझड़।
न क़ब्र-ए-हयात में हूँ, न मौजों की रात में,
मैं आशिक़-ए-फ़िगार हूँ, अल्लाह की तौफ़ीक़ से।
