इक और सावन नाच ले,
इक और सावन झूम ले।
जीवन का जीवन ही क्या,
जीते इक उड़ता धुआँ।
जाने दूर से उठा हो इक दिया,
कुछ देर तो उड़ता रहा,
फिर आसमाँ में खो गया।
जैसे सागर से मिलकर नदी,
फिर नदी बन जाती नहीं।
सूरज से निकली ये किरण,
फिर सूरज में समाती नहीं।
सुमन से हटकर सुगंध,
फिर सुमन में समाती नहीं।
वैसे ही बीता श्वास,
फिर पुनः लौटता नहीं।
इसलिए जीवन मिला तुझको,
मनन करने की इक बात है।
कहाँ से जुड़ी है चेतना,
तब तक आगे बढ़ाते हैं।
तू सावन-सा जीवन बना ले,
कला फूलों से चुरा ले।
शांत सागर हृदय के भीतर,
रख भाव-नाद विराट विशाल।
इसे एक पल के सावन की,
मस्त मस्ती झूम ले।
इक और-सा बन…
श्रावण नाद से सीख ले,
तू ईश्वर को पहचान।
धरती में बहती ये पवन,
हर्षित करे वसुंधरा।
इसमें कहीं देखो नहीं,
कि बाग़ है, खलिहान है।
ये बाँटता जीवन है,
सघन है, सुनसान है।
वाचाल या वीरान है।
झूमती रहती सदा,
लेकर मस्ती में मगन।
चाहे सूखी हो ये धरा,
चाहे झूमे ये गगन।
रसे विपुल भाव को,
अंतःकरण में ढूँढ़ ले।
इक और सावन नाच ले,
इक और सावन झूम ले।
दूर मरुभूमि के भीतर,
खोज रहा हूँ इसके अंबर।
तृष्णाओं का मारा हुआ,
मृगतृष्णा का लोभी हूँ मैं।
दूर दिखती रेत पर,
ये झिलमिलाती मरीचिका।
है माया इक प्रकृति की,
तू प्यासा लौट आएगा।
होना चाहता हूँ तृप्त तू,
ले ढूँढ़ ले सरवर कोई।
शीतल हो तन, शीतल मन,
हो सुमन कोटर घर कोई।
और ऐसी सुमन की कला बना ले,
सकल सृष्टि झूम ले।
इक और सावन नाच ले,
इक और सावन झूम ले।
